मोबाइल फोन की लत कैसे बर्बाद कर रही है हमारी नई पीढ़ी को —Athahprem
अब ज़रा आज के समय की एक शाम की कल्पना कीजिए... उसी घर में पापा अपने फोन पर खबरें पढ़ रहे हैं, माँ इंटरनेट पर कोई टीवी कार्यक्रम देख रही हैं, 10 साल की बच्ची दूसरे कमरे में सोशल मीडिया चला रही है और 3 साल का बच्चा फर्श पर बैठकर टेबलेट पर छोटे वीडियो देख रहा है। ये चारों लोग शरीर से तो एक ही जगह पर मौजूद हैं, लेकिन मानसिक रूप से अपनी-अपनी अलग आभासी दुनिया में खोए हुए हैं। घर में कोई आवाज़ नहीं, कोई बातचीत नहीं और कोई जुड़ाव नहीं, सिर्फ चेहरों पर स्क्रीन की नीली रोशनी पड़ रही है!
पहली नज़र में यह एक बहुत ही आम और नुकसान न पहुँचाने वाला नज़ारा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत ही खौफनाक सच छिपा है। आज बच्चे बाहर खेलने के लिए जितना समय निकालते हैं, वह जेल में बंद कैदियों से भी कम होता है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम इसी "डिजिटल महामारी" और उसके भयंकर परिणामों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।
डराने वाले आँकड़े और कड़वी सच्चाई:
हाल ही में भारत के शहरी क्षेत्रों में 70,000 से अधिक माता-पिता पर एक बड़ा सर्वेक्षण किया गया था। इस सर्वेक्षण के नतीजे चौंकाने वाले थे। 66% से ज्यादा माता-पिता ने माना कि उनके बच्चों को सोशल मीडिया, इंटरनेट वाले कार्यक्रमों या ऑनलाइन खेलों की भयंकर लत है। 58% अभिभावकों ने यह तक बताया कि इस लत के कारण उनके बच्चों में गुस्सा और चिड़चिड़ापन बहुत ज्यादा बढ़ गया है।
कुछ सच्ची घटनाएँ जो आपकी आँखें खोल देंगी:
मोबाइल की स्क्रीन के भयंकर शारीरिक और मानसिक नुकसान:
1. दूर की नज़र कमज़ोर होना (मायोपिया)
मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने का मतलब है कि बच्चे घर के अंदर ज्यादा रहते हैं और प्राकृतिक रोशनी (धूप) से दूर रहते हैं। इसकी वजह से आंखों में मायोपिया का खतरा काफी बढ़ जाता है। डॉक्टरों का मानना है कि अगर यही हाल रहा, तो 2050 तक भारत के आधे से ज्यादा बच्चों की आंखें खराब हो जाएंगी और उन्हें चश्मे लग जाएंगे।
2. नींद की कमी और बीमारियां
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाली नीली रोशनी हमारे शरीर में नींद लाने वाले हार्मोन को दबा देती है। बच्चों में यह प्रभाव वयस्कों के मुकाबले दुगुना होता है। मोबाइल देखने का समय हर एक घंटा बढ़ने से बच्चों की नींद कम हो जाती है, जिससे स्कूल में उनका प्रदर्शन खराब होता है और मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा होती हैं।
3. मोटापा और खराब पाचन
ज्यादा मोबाइल चलाने का सीधा मतलब है शरीर का हिलना-डुलना बंद होना। बच्चे घर में बैठे-बैठे वीडियो देखते रहते हैं जिससे मोटापे का खतरा बढ़ता है। कई माता-पिता बच्चों को खाना खिलाते समय फोन दिखाते हैं ताकि वे शांति से खा लें। इसका नुकसान यह है कि ध्यान भटकने के कारण बच्चे खाने को बहुत देर तक मुंह में रखते हैं, जिससे दांतों में कीड़े लगते हैं। वे खाने को ठीक से चबाते नहीं हैं, जिससे पाचन से जुड़ी बीमारियां होती हैं।
4. मस्तिष्क के विकास में रुकावट
मोबाइल का बच्चों के मानसिक विकास पर सीधा असर होता है। जीवन के शुरुआती सालों में विकसित होने वाली निर्णय लेने और भावनाओं को समझने की क्षमता कमज़ोर रह जाती है। यह वे गुण हैं जो हमें गुस्सा काबू करने, लोगों से बात करने और लक्ष्य हासिल करने में मदद करते हैं। बच्चे मोबाइल स्क्रीन से इस कदर सम्मोहित हो जाते हैं कि उनके आस-पास क्या हो रहा है, उन्हें कोई खबर नहीं होती।
बोलने में देरी और आभासी ऑटिज्म:
आजकल बहुत से बच्चों में देर से बोलने की समस्या देखने को मिल रही है। एक मामले में एक बच्ची ने 2 साल में 'मम्मा-पापा' बोलना शुरू किया, लेकिन फिर उसे इतना ज्यादा मोबाइल दिखाया गया कि 5 साल की उम्र तक वह सिर्फ कुछ ही शब्द बोल पाती थी। बच्चे केवल सुनकर नहीं, बल्कि दोतरफा बातचीत और माता-पिता के होठों की हरकत देखकर बोलना सीखते हैं। मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से 'आभासी ऑटिज्म' (Virtual Autism) का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है। इसमें बच्चों का समाज से कट जाना, भाषा का विकास न होना और ध्यान केंद्रित न कर पाना शामिल है।
बड़े बच्चों में डिप्रेशन और घबराहट: अगर आपको लगता है कि यह सब सिर्फ छोटे बच्चों के साथ होता है, तो आप गलत हैं। बड़े बच्चों में भी ज़्यादा फोन इस्तेमाल करने की वजह से डिप्रेशन और घबराहट का खतरा बढ़ जाता है।
माता-पिता क्या करें? (समाधान)
अपने परिवार और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए आज ही इस दिशा में सख्त कदम उठाएं!
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