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मोबाइल फोन की लत कैसे बर्बाद कर रही है हमारी नई पीढ़ी को —Mobile Phone Addiction

मोबाइल फोन की लत कैसे बर्बाद कर रही है हमारी नई पीढ़ी को —Athahprem

ज़रा कल्पना कीजिए 1990 के दशक की एक शाम की... पापा सोफे पर बैठकर अखबार पढ़ रहे हैं, माँ उनके पास बैठकर दिन भर की अपनी बातें साझा कर रही हैं, एक 10 साल की बच्ची अपना स्कूल का काम (गृहकार्य) करते हुए माता-पिता से गणित के सवाल पूछ रही है और एक 3 साल का बच्चा फर्श पर अपनी खिलौना गाड़ियों के साथ खेल रहा है। पूरे घर में बातचीत हो रही है, हंसी-मज़ाक चल रहा है और परिवार में एक गहरा अपनापन है। यहाँ हर कोई शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों से एक ही जगह मौजूद है।

अब ज़रा आज के समय की एक शाम की कल्पना कीजिए... उसी घर में पापा अपने फोन पर खबरें पढ़ रहे हैं, माँ इंटरनेट पर कोई टीवी कार्यक्रम देख रही हैं, 10 साल की बच्ची दूसरे कमरे में सोशल मीडिया चला रही है और 3 साल का बच्चा फर्श पर बैठकर टेबलेट पर छोटे वीडियो देख रहा है। ये चारों लोग शरीर से तो एक ही जगह पर मौजूद हैं, लेकिन मानसिक रूप से अपनी-अपनी अलग आभासी दुनिया में खोए हुए हैं। घर में कोई आवाज़ नहीं, कोई बातचीत नहीं और कोई जुड़ाव नहीं, सिर्फ चेहरों पर स्क्रीन की नीली रोशनी पड़ रही है!

पहली नज़र में यह एक बहुत ही आम और नुकसान न पहुँचाने वाला नज़ारा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत ही खौफनाक सच छिपा है। आज बच्चे बाहर खेलने के लिए जितना समय निकालते हैं, वह जेल में बंद कैदियों से भी कम होता है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम इसी "डिजिटल महामारी" और उसके भयंकर परिणामों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

Children Mobile Addiction

डराने वाले आँकड़े और कड़वी सच्चाई:

हाल ही में भारत के शहरी क्षेत्रों में 70,000 से अधिक माता-पिता पर एक बड़ा सर्वेक्षण किया गया था। इस सर्वेक्षण के नतीजे चौंकाने वाले थे। 66% से ज्यादा माता-पिता ने माना कि उनके बच्चों को सोशल मीडिया, इंटरनेट वाले कार्यक्रमों या ऑनलाइन खेलों की भयंकर लत है। 58% अभिभावकों ने यह तक बताया कि इस लत के कारण उनके बच्चों में गुस्सा और चिड़चिड़ापन बहुत ज्यादा बढ़ गया है।

सबसे डराने वाली बात यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि 2 साल से कम उम्र के बच्चों का मोबाइल देखने का समय बिल्कुल 'शून्य' होना चाहिए और 2 से 4 साल की उम्र के बच्चों का अधिकतम 1 घंटे का समय होना चाहिए। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का औसत मोबाइल देखने का समय 2.2 घंटे है और 2 साल से छोटे बच्चों का 1.2 घंटे है, जो कि बिल्कुल शून्य होना चाहिए।

कुछ सच्ची घटनाएँ जो आपकी आँखें खोल देंगी:

1. आरव की कहानी: आरव के माता-पिता दोनों नौकरीपेशा थे। जब वह सिर्फ 1 साल का था, तब व्यस्तता के कारण उन्होंने उसे स्मार्टफोन देना शुरू कर दिया ताकि वह शांत रहे। धीरे-धीरे उसे ऐसी लत लगी कि वह बिना फोन के खाना तक नहीं खाता था। 4 साल की उम्र में उसे खुद का फोन मिल गया। नतीजा यह हुआ कि उसकी आँखें खराब हो गईं और चश्मा लग गया। जब सिरदर्द की शिकायत पर डॉक्टर ने फोन दूर रखने को कहा और माता-पिता ने फोन छीनने की कोशिश की, तो आरव किसी नशेड़ी की तरह दीवार पर अपना सिर मारने लगा।
2. किशन की कहानी (12 साल का बच्चा): महामारी के समय पढ़ाई के लिए किशन को एक टेबलेट मिला। धीरे-धीरे उसने गेम खेलना और सोशल मीडिया चलाना शुरू कर दिया और वह पूरी तरह इसकी गिरफ्त में आ गया। उसने परिवार से बात करना बंद कर दिया, खाना आधा कर दिया और रातों की नींद गायब हो गई। जब जांच हुई तो पता चला कि वह कुपोषित हो गया था और गहरे अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार था।
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मोबाइल की स्क्रीन के भयंकर शारीरिक और मानसिक नुकसान:

1. दूर की नज़र कमज़ोर होना (मायोपिया)

मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने का मतलब है कि बच्चे घर के अंदर ज्यादा रहते हैं और प्राकृतिक रोशनी (धूप) से दूर रहते हैं। इसकी वजह से आंखों में मायोपिया का खतरा काफी बढ़ जाता है। डॉक्टरों का मानना है कि अगर यही हाल रहा, तो 2050 तक भारत के आधे से ज्यादा बच्चों की आंखें खराब हो जाएंगी और उन्हें चश्मे लग जाएंगे।

2. नींद की कमी और बीमारियां

इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाली नीली रोशनी हमारे शरीर में नींद लाने वाले हार्मोन को दबा देती है। बच्चों में यह प्रभाव वयस्कों के मुकाबले दुगुना होता है। मोबाइल देखने का समय हर एक घंटा बढ़ने से बच्चों की नींद कम हो जाती है, जिससे स्कूल में उनका प्रदर्शन खराब होता है और मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा होती हैं।

3. मोटापा और खराब पाचन

ज्यादा मोबाइल चलाने का सीधा मतलब है शरीर का हिलना-डुलना बंद होना। बच्चे घर में बैठे-बैठे वीडियो देखते रहते हैं जिससे मोटापे का खतरा बढ़ता है। कई माता-पिता बच्चों को खाना खिलाते समय फोन दिखाते हैं ताकि वे शांति से खा लें। इसका नुकसान यह है कि ध्यान भटकने के कारण बच्चे खाने को बहुत देर तक मुंह में रखते हैं, जिससे दांतों में कीड़े लगते हैं। वे खाने को ठीक से चबाते नहीं हैं, जिससे पाचन से जुड़ी बीमारियां होती हैं।

4. मस्तिष्क के विकास में रुकावट

मोबाइल का बच्चों के मानसिक विकास पर सीधा असर होता है। जीवन के शुरुआती सालों में विकसित होने वाली निर्णय लेने और भावनाओं को समझने की क्षमता कमज़ोर रह जाती है। यह वे गुण हैं जो हमें गुस्सा काबू करने, लोगों से बात करने और लक्ष्य हासिल करने में मदद करते हैं। बच्चे मोबाइल स्क्रीन से इस कदर सम्मोहित हो जाते हैं कि उनके आस-पास क्या हो रहा है, उन्हें कोई खबर नहीं होती।

बोलने में देरी और आभासी ऑटिज्म:

आजकल बहुत से बच्चों में देर से बोलने की समस्या देखने को मिल रही है। एक मामले में एक बच्ची ने 2 साल में 'मम्मा-पापा' बोलना शुरू किया, लेकिन फिर उसे इतना ज्यादा मोबाइल दिखाया गया कि 5 साल की उम्र तक वह सिर्फ कुछ ही शब्द बोल पाती थी। बच्चे केवल सुनकर नहीं, बल्कि दोतरफा बातचीत और माता-पिता के होठों की हरकत देखकर बोलना सीखते हैं। मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से 'आभासी ऑटिज्म' (Virtual Autism) का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है। इसमें बच्चों का समाज से कट जाना, भाषा का विकास न होना और ध्यान केंद्रित न कर पाना शामिल है।

बच्चों के 'मासूम' दिखने वाले कार्टून का काला सच: इंटरनेट पर मौजूद कुछ लोकप्रिय कार्टून चैनल ऊपर से देखने में बहुत मासूम लगते हैं, लेकिन इन वीडियो में बहुत चटक रंगों का इस्तेमाल होता है, तेज़ संगीत होता है और हर 2-3 सेकंड में दृश्य बदल जाता है। यह सब वैज्ञानिक रूप से तैयार किया गया है ताकि बच्चे इसके पूरी तरह आदी बन जाएं। ऐसे तेज़ गति वाले वीडियो देखने से बच्चों की ध्यान लगाने की क्षमता कम हो जाती है और उन्हें असल जिंदगी बहुत उबाऊ लगने लगती है।

बड़े बच्चों में डिप्रेशन और घबराहट: अगर आपको लगता है कि यह सब सिर्फ छोटे बच्चों के साथ होता है, तो आप गलत हैं। बड़े बच्चों में भी ज़्यादा फोन इस्तेमाल करने की वजह से डिप्रेशन और घबराहट का खतरा बढ़ जाता है।

Mobile Phone Addiction

माता-पिता क्या करें? (समाधान)

1. छोटे बच्चों के लिए 'शून्य' मोबाइल समय: कम से कम 2 साल (और हो सके तो 5 साल) की उम्र तक बच्चों को हर तरह की स्क्रीन से दूर रखें। उन्हें न तो कार्टून दिखाएं और न ही फोन पर कोई वीडियो।
2. बच्चों के साथी बनें, उन पर चिल्लाएं नहीं: अगर बच्चा पहले से लत का शिकार है, तो उस पर गुस्सा न करें। आपको खुद को बच्चे के साथ एक टीम में रखना है और मोबाइल को अपना दुश्मन मानना है।
3. खुद आदर्श बनें (सबसे ज़रूरी): बच्चे शब्दों से ज्यादा आपके कामों से सीखते हैं। अगर आप खुद पूरा दिन फोन चलाएंगे, तो बच्चा भी वही करेगा। इसलिए बच्चों के सामने अपना फोन कम से कम इस्तेमाल करें।
4. दादा-दादी और रिश्तेदारों को समझाएं: कई बार माता-पिता सख्त होते हैं लेकिन दादा-दादी प्यार में बच्चे को फोन पकड़ा देते हैं। उन्हें इस समस्या की गंभीरता के बारे में समझाएं।
5. घर में 'मोबाइल मुक्त क्षेत्र' बनाएं: घर के कुछ हिस्सों जैसे भोजन कक्ष (डाइनिंग रूम) और शयनकक्ष को पूरी तरह मोबाइल मुक्त घोषित कर दें। वहाँ किसी को भी फोन इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
6. बाहर के खेल और दिमागी खेलों को बढ़ावा दें: बड़े बच्चों के लिए दिन में कम से कम 3 घंटे बाहर खेलने का समय तय करें। घर के अंदर उन्हें पहेलियां सुलझाने, किताबें पढ़ने और लूडो या कैरम जैसे खेल खेलने के लिए प्रेरित करें।

अपने परिवार और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए आज ही इस दिशा में सख्त कदम उठाएं!

।। राधे-राधे ।।

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