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एक छात्र ने पूछा भगवान का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, फिर भी विश्वास क्यों? जानें महाराज जी ने क्या कहा

एक छात्र ने पूछा भगवान का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, फिर भी विश्वास क्यों?

Premanand Ji Maharaj
राधे राधे, मित्रों! आज हम एक बहुत ही गहरे और रोचक विषय पर बात करने जा रहे हैं जो अक्सर हमारे दिमाग में आता है—विज्ञान और भगवान। जो लोग विज्ञान पढ़ते हैं, वे हर चीज़ में तर्क और प्रमाण खोजते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि "जब हमने भगवान को देखा ही नहीं और उनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण भी नहीं है, तो हम उन पर विश्वास कैसे करें?"

हाल ही में एक सत्संग के दौरान, एक विज्ञान के छात्र ने ठीक यही प्रश्न पूज्य महाराज जी से पूछा। इस ब्लॉग पोस्ट में हम महाराज जी द्वारा दिए गए इस अद्भुत, तार्किक और संतोषजनक उत्तर पर विस्तार से चर्चा करेंगे। चलिए शुरू करते हैं —

विज्ञान के छात्र का सवाल और उसकी दुविधा:

चर्चा की शुरुआत में एक विज्ञान का विद्यार्थी महाराज जी के सामने अपनी दुविधा व्यक्त करता है। वह कहता है कि उसने अपना पूरा जीवन तार्किक सोच (logical thinking) और विश्लेषण के साथ जिया है। इसी कारण अध्यात्म और भगवान के मार्ग पर उसे बहुत कठिनाई आ रही है। उसका सीधा सा तर्क है कि जब उसने भगवान को प्रत्यक्ष रूप से देखा ही नहीं और उनका कोई ठोस प्रमाण भी नहीं है, तो वह उन पर कैसे विश्वास कर ले? विज्ञान हर बात का सबूत मांगता है, तो ईश्वर का सबूत क्या है?

मां के वचनों का अटूट विश्वास:

छात्र के इस तार्किक सवाल का महाराज जी बहुत ही सुंदर और सरल व्यावहारिक उदाहरण देकर उत्तर देते हैं। वह पूछते हैं कि कोई भी व्यक्ति अपने पिता का प्रमाण कैसे खोजता है? एक बच्चे को उसके पिता की पहचान केवल उसकी मां के वचनों से होती है। जिस तरह हम अपनी मां की बात पर बिना किसी तर्क या डीएनए टेस्ट के विश्वास कर लेते हैं कि अमुक व्यक्ति ही हमारा पिता है, ठीक उसी तरह अध्यात्म में गुरु के वचनों पर दृढ़ विश्वास करना पड़ता है। हर रिश्ते और सत्य को केवल तार्किक वृत्ति से नहीं तौला जा सकता।
Premanand Ji Maharaj Ke Pravachan

क्या विज्ञान हमारे मन और आत्मा को देख सकता है?

महाराज जी विज्ञान की सीमाओं पर एक बहुत ही सटीक बात कहते हैं। वह छात्र से कहते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों के पास जाकर अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन या एक्स-रे करवा कर देखो। क्या कोई भी मशीन या वैज्ञानिक आपके 'मन' की तस्वीर स्क्रीन पर दिखा सकता है? विज्ञान केवल हमारे इस पांच भौतिक ढांचे (Physical Body) का एक्स-रे कर सकता है। जो सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर और हमारी चेतना (चेतन तत्व) है, उसे विज्ञान की कोई भी मशीन नहीं पकड़ सकती।

हम केवल शरीर नहीं, अविनाशी आत्मा हैं:

हम सभी खुद को शीशे में देखते हैं और इस हाड़-मांस के शरीर को ही अपना असली रूप मान बैठते हैं। महाराज जी समझाते हैं कि यह शरीर तो केवल एक पोशाक या वर्दी है, जो पंचतत्वों से बनी है। मृत्यु के बाद जब चेतन तत्व (आत्मा) शरीर से निकल जाता है, तो लोग इसी शरीर को जला देते हैं या दफना देते हैं। यदि इंसान का कोई अंग कट भी जाए, तब भी 'मैं' (आत्मा) मौजूद रहता है। इसलिए, जब हम अपने असली स्वरूप (आत्मा) को ही आज तक भौतिक आंखों से या किसी मशीन से नहीं देख पाए हैं, तो फिर जो पूरी सृष्टि का रचयिता (परमात्मा) है, उसे हम इन साधारण आंखों से देखने की जिद कैसे कर सकते हैं?

भगवान से मिलने की योग्यता और अधिकार:

महाराज जी एक और बहुत ही शानदार उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि अगर आप भारत के नागरिक हैं और भारत के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलना चाहते हैं, तो क्या आप जब चाहें जाकर उनसे हाथ मिला सकते हैं? बिल्कुल नहीं! आपको उनसे मिलने के लिए अपनी योग्यता और आवश्यकता साबित करनी पड़ेगी। इसमें काफी समय, नियम और प्रयास लगता है। अगर देश के एक प्रधानमंत्री से मिलने के लिए इतनी योग्यता चाहिए, तो जो अनंत कोटि ब्रह्मांड का स्वामी है, उससे साक्षात्कार करने के लिए तो आपको अपनी आध्यात्मिक योग्यता (भक्ति और समर्पण) साबित करनी ही पड़ेगी।
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श्रद्धा, विश्वास और आराधना का मार्ग:

अंत में महाराज जी यह स्पष्ट करते हैं कि भगवान को जानने का मार्ग केवल तर्क और बुद्धि से होकर नहीं जाता। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी स्पष्ट लिखा है कि बिना श्रद्धा और विश्वास के इंसान अपने अंतःकरण में बैठे भगवान को नहीं देख सकता। ईश्वर को जानने के लिए केवल बौद्धिक बहस काफी नहीं है; इसके लिए भजन, आराधना और गहरा प्रेम चाहिए। जब आप गुरु के वचनों को सत्य मानकर हृदय से भगवान की भक्ति करेंगे, तो आपको स्वयं ही उनके होने का अनुभव हो जाएगा। ईश्वर स्वयं प्रमाण हैं, उन्हें किसी भौतिक प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
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यह पूरी चर्चा हमें सिखाती है कि विज्ञान अपनी जगह बिल्कुल सही है, लेकिन उसकी एक सीमा है। जो चीज़ें भौतिक हैं, विज्ञान उन्हें साबित कर सकता है। लेकिन परमात्मा, आत्मा, मन और हमारी भावनाएं विज्ञान की मशीनों की पहुंच से बहुत दूर हैं। इन्हें केवल दृढ़ विश्वास, गुरु की कृपा और निरंतर भक्ति के माध्यम से ही महसूस किया जा सकता है। इसलिए तर्कों की दुनिया से थोड़ा ऊपर उठकर प्रेम और श्रद्धा का मार्ग अपनाएं, ईश्वर स्वयं आपको अपने दर्शन की अनुभूति करा देंगे।

जिस तरह हवा दिखाई नहीं देती पर उसका झोंका हमें महसूस होता है, उसी तरह ईश्वर दिखाई नहीं देते पर उनकी कृपा हमारे जीवन के हर मोड़ पर काम करती है। जब बुद्धि थक जाती है, वहीं से विश्वास की यात्रा शुरू होती है। याद रखें, विश्वास ही वह सेतु है जो हमें मनुष्य से परमात्मा तक ले जाता है।

क्या आपने कभी ईश्वर की उपस्थिति को महसूस किया है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। इस जानकारीपूर्ण पोस्ट को अपने उन दोस्तों के साथ भी शेयर करें जो विज्ञान और अध्यात्म के बीच कंफ्यूज हैं।
।। राधे-राधे ।।
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