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रिश्तों में कड़वाहट क्यों आती है? —जानिये प्रेमानंदजी महाराज से

रिश्तों में कड़वाहट क्यों आती है? —जानिये प्रेमानंदजी महाराज से

राधे-राधे दोस्तों! 'Athahprem' में आपका स्वागत है।

आज की दुनिया में, हम अक्सर आकर्षण, जरूरत या मोह को ही 'प्यार' समझ लेते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि अगर वह प्यार सच्चा था, तो रिश्ते टूटते क्यों हैं? क्यों 'ब्रेकअप' और 'तलाक' जैसे शब्द इतने आम हो गए हैं?

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज के इस अद्भुत सत्संग में, उन्होंने प्रेम की उस गहराई को छुआ है, जहाँ स्वार्थ का कोई स्थान नहीं है। आज की इस पोस्ट में, हम जानेंगे कि आखिर 'वासना' (Lust) और 'प्रेम' (Love) के बीच की महीन रेखा क्या है और कैसे हम उस दिव्य प्रेम को पा सकते हैं जो कभी खत्म नहीं होता। चलिए, तो इस यात्रा की शुरुआत करते हैं..

Premanand Ji Maharaj

प्रेमानंद जी के प्रवचन का सार

  • प्रेम बनाम काम (Love vs. Lust/Attachment):
    महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि यदि हम किसी के शरीर, धन, पद या रूप को देखकर आकर्षित होते हैं, तो वह प्रेम नहीं है। उसे 'काम', 'राग' या 'स्वार्थ' कहते हैं। संसार में जिसे हम प्यार कहते हैं, वह अक्सर अपनी सुख-सुविधाओं की पूर्ति का एक साधन मात्र होता है।
  • सच्चे प्रेम की पहचान (Characteristics of True Love):
    सच्चा प्रेम वह है जो "प्रतिक्षण वर्धमान" हो, यानी जो हर पल बढ़ता रहे। अगर आपका प्यार समय के साथ घटता है, या किसी और बेहतर व्यक्ति के मिलने पर बदल जाता है, तो वह प्यार नहीं बल्कि व्यापार है। सच्चा प्रेम 'भगवत स्वरूप' होता है और इसमें कभी पूर्णता नहीं आती, यह अनंत है।
Premanand Ji Thoughts
  • त्याग ही प्रेम है (Love is Sacrifice):
    महाराज जी एक बहुत बड़ी बात कहते हैं—अगर आप किसी से सच्चा प्रेम करते हैं, तो आप उसे सुखी देखना चाहेंगे, भले ही वह आपके साथ न हो। सांसारिक मोह कहता है "तुम सिर्फ मेरे हो", लेकिन सच्चा प्रेम कहता है "तुम जहाँ भी रहो, सुखी रहो"। अपने प्रियतम की खुशी के लिए अपने सुख का त्याग करना ही असली प्रेम है।
  • ईश्वर का भाव (Seeing God in Everyone):
    प्रेम केवल परमात्मा से हो सकता है। यदि आप माता-पिता, पत्नी या पुत्र से भी प्रेम करते हैं, तो उसमें 'ईश्वर का भाव' होना चाहिए। जैसे नामदेव जी ने कुत्ते में भी भगवान विट्ठल को देखा था। यदि रिश्तों में भगवान का भाव नहीं है, तो वह रिश्ता अंततः दुख और घृणा में बदल जाएगा।
True Love
  • प्रेम कैसे प्राप्त करें? (How to Attain Divine Love):
    ईश्वर सर्वत्र हैं, लेकिन वे 'प्रेम' से ही प्रकट होते हैं। इस प्रेम को पाने के लिए निरंतर 'नाम जप', पवित्र आचरण, और संतों का संग (सत्संग) आवश्यक है। कबीर दास जी का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं— "पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"
  • विरह और मिलन (Separation and Union):
    प्रेम का स्वभाव ऐसा है कि प्रेमी अपने प्रियतम (ईश्वर) के पास होते हुए भी वियोग महसूस करता है। उसे हर पल यह चिंता रहती है कि कहीं वह दूर न हो जाए। प्रियतम की फिक्र करना और उसे नैनों में बसाना ही प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है।
Radhe Krishna

अंत में, पूज्य प्रेमानंद जी महाराज का यह सत्संग हमें एक ही सत्य की ओर ले जाता है— प्रेम कोई बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति है। संसार में जिसे हम प्रेम समझकर पकड़ने की कोशिश करते हैं, वही हमें दुख देता है। लेकिन जब हम अपने प्रेम के केंद्र में परमात्मा को रख देते हैं, तो वही प्रेम 'अथाह' और 'अनंत' हो जाता है।

महाराज जी की बातों का सार यही है कि यदि आप अपने रिश्तों में शांति और आनंद चाहते हैं, तो अपेक्षाओं (Expectations) को छोड़िए और सेवा भाव को अपनाइए। सच्चा प्रेमी वह नहीं जो साथ रहने की शर्त रखे, बल्कि वह है जो अपने प्रियतम की खुशी में अपनी खुशी देखे।

उम्मीद है कि Athahprem की यह प्रस्तुति आपके जीवन में प्रेम का एक नया और पवित्र दृष्टिकोण लेकर आएगी।

आपकी राय हमारे लिए अनमोल है:

क्या आपने कभी उस 'निस्वार्थ प्रेम' का अनुभव किया है जिसकी चर्चा महाराज जी ने की? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार साझा करें और इस संदेश को अपनों के साथ साझा (Share) करना न भूलें।

राधे-राधे!

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