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Mahashivratri Special: प्रेमानंद जी को काशी में कैसे हुए भगवान शिव के साक्षात दर्शन?

महाशिवरात्रि विशेष: प्रेमानंद जी को काशी में कैसे हुए भगवान शिव के साक्षात दर्शन?

क्या आप जानते हैं कि वृंदावन के रसिक संत, श्रद्धेय प्रेमानंद जी महाराज की भक्ति की नींव कहाँ से जुड़ी है? अक्सर भक्त यह सोचते हैं कि महाराज जी राधा-कृष्ण के अनन्य उपासक हैं, तो भगवान शिव से उनका क्या संबंध है?

हाल ही में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर, महाराज जी ने अपने हृदय का वह गुप्त द्वार खोला, जिसके भीतर उनके जीवन का सबसे बड़ा सत्य छिपा था। यह केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि हर उस साधक के लिए एक मार्ग है जो ईश्वर प्रेम की प्यास रखता है। आज हम जानेंगे कि कैसे काशी के 'शिव' ने प्रेमानंद जी का हाथ पकड़कर उन्हें वृंदावन के 'श्याम' तक पहुँचाया।

Premanandji Maharaj

भगवान शिव की भूमिका और उनके साक्षात दर्शन के अनुभव को साझा किया है। यहाँ उनके प्रवचन का विश्लेषण है:

  • बचपन से शिव की कृपा:
    महाराज जी ने बताया कि उनका जन्म एक ऐसे कुल में हुआ जहाँ भगवान शिव की ही आराधना होती थी। उनके जीवन की शुरुआत, ब्रह्मचर्य पालन और काशी वास—सब कुछ महादेव की कृपा से ही संभव हुआ। वे स्पष्ट कहते हैं कि जिस पर शिव की कृपा नहीं होती, उसे कभी भी 'भगवत प्रेम' प्राप्त नहीं हो सकता।
  • मायके और ससुराल का अद्भुत उदाहरण:
    महाराज जी ने एक बहुत ही भावुक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, "जैसे एक बेटी का विवाह हो जाता है, तो वह पति के घर (ससुराल) में रम जाती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने माता-पिता (मायके) को भूल गई है।" महाराज जी के लिए भगवान शिव 'माता-पिता' (मायके) के समान हैं जिन्होंने उन्हें पाला और फिर उनका हाथ 'प्रिया-प्रीतम' (राधा-कृष्ण) के हाथों में सौंप दिया।
Kashi Vishwanath Premanand Ji
  • भगवान राम का गुप्त मत:
    महाराज जी ने रामचरितमानस का हवाला देते हुए कहा— "शंकर भजन बिना नर भगत न पावे मोर।" अर्थात, भगवान शंकर की आराधना के बिना किसी को भी राम (या कृष्ण) की भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। शिव गुरु रूप में पहले प्यास जगाते हैं और फिर इष्ट रूप में उसे शांत करते हैं।
  • काशी में साक्षात दर्शन का अनुभव:
    जब वे काशी के घाटों पर 'आकाशवृत्ति' से रहते थे, तो एक दिन दोपहर 12 बजे उन्हें एक दिव्य स्वरूप के दर्शन हुए—नंगे पैर, भगवा वस्त्र, जटाएं और हाथ में त्रिशूल। उस दिव्य स्वरूप ने महाराज जी को देखकर केवल एक उंगली उठाई और अंतर्ध्यान हो गए। इसका संकेत था— "एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति" (ईश्वर एक ही है)।
Mahashivratri

पूर्ण तृप्ति की अवस्था

अंत में महाराज जी कहते हैं कि महादेव ने उन्हें इतना 'निहाल' कर दिया है कि अब कोई जिज्ञासा शेष नहीं रही। भक्ति में भेद नहीं, केवल भाव होता है। प्रेम का मार्ग 'एक' का है, द्वैत का नहीं। भगवान शिव आपके हृदय में भक्ति का दीपक जलाए रखें।

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।। हर हर महादेव ।।

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