अगर भगवान को पाना है, तो आज ही छोड़ दें ये 2 बुरी आदतें
क्या आपने कभी सोचा है कि घंटों नाम जप और पूजा-पाठ करने के बाद भी हमारे जीवन में शांति क्यों नहीं आती? क्यों हमारा मन भक्ति में स्थिर नहीं हो पाता? अक्सर हम बाहरी कर्मकांडों में तो उलझे रहते हैं, लेकिन उन सूक्ष्म गलतियों को नजरअंदाज कर देते हैं जो हमारे संचित पुण्यों को दीमक की तरह चाट रही हैं।
परम पूज्य श्री हित प्रेमानंद जी महाराज अक्सर कहते हैं कि भक्ति का मार्ग जितना सरल है, उतना ही सावधान रहने वाला भी है। अगर आप सच में अपने जीवन में 'अथाह प्रेम' का अनुभव करना चाहते हैं और भगवान के करीब जाना चाहते हैं, तो आपको अपने जीवन से दो ऐसी चीजों को तुरंत बाहर करना होगा जो आपके आध्यात्मिक विकास को रोक रही हैं। आज के इस विशेष लेख में हम महाराज जी के उन वचनों को गहराई से समझेंगे जो हमें नरक के द्वार से बचाकर श्री राधा वल्लभ लाल के चरणों तक ले जा सकते हैं।
दूसरों की निंदा: अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना
महाराज जी ने इस सत्संग में सबसे कड़ा प्रहार 'निंदा' (दूसरों की बुराई) पर किया है। वे कहते हैं कि यदि आप किसी की निंदा करते हैं, तो उस व्यक्ति का दोष आपके अंदर बहुतायत रूप में आ जाता है। यह एक आध्यात्मिक नियम है—आप जिसके बारे में सोचेंगे या जिसकी चर्चा करेंगे, उसके गुण या दोष आपके हृदय में प्रवेश कर जाएंगे।
निंदा सुनना भी अपराध है:
महाराज जी स्पष्ट आदेश देते हैं कि केवल निंदा करना ही नहीं, बल्कि निंदा सुनना भी उतना ही खतरनाक है। वे कहते हैं, "जैसे ही कोई किसी की बुराई करना शुरू करे, तत्काल अपने कान बंद कर लो या वहां से हट जाओ।" निंदा सुनने में हमारा मन बहुत राजी रहता है, हमें दूसरों की कमियां जानने में रस आता है, लेकिन यही रस हमारे 'भजन' को नष्ट कर देता है।
भजन में विक्षेप:
अगर आप भजन करते हैं और आपके मुख से किसी के प्रति कोई हल्का या अपमानजनक शब्द निकल जाता है, तो तुरंत आपके भजन की शक्ति कम हो जाएगी। यह सूक्ष्म विज्ञान है—शब्दों की अपनी ऊर्जा होती है। नकारात्मक शब्द हमारे हृदय की कोमलता को खत्म कर देते हैं।
मोह और राग का जाल
जीवन में दूसरी सबसे बड़ी बाधा है 'ममता' और 'मोह'। महाराज जी कहते हैं कि यह शरीर, परिवार, संपत्ति और रिश्ते सब माया का खेल हैं। हम इस संसार में बार-बार पैदा होते हैं और हर बार नए माता-पिता, नए घर और नए रिश्तों में बंध जाते हैं। पिछले जन्मों के रिश्ते हमें याद तक नहीं रहते, फिर इस जन्म के रिश्तों में इतनी आसक्ति क्यों?
गृहस्थी में सन्यास का अर्थ:
महाराज जी का यह संदेश बहुत अद्भुत है। वे कहते हैं कि सन्यास का मतलब केवल घर छोड़ना नहीं है, बल्कि 'राग' (Attachment) को छोड़ना है।
- निवृत्ति मार्ग: जो सब कुछ छोड़कर पूरी तरह भगवान को समर्पित हो गए।
- प्रवृत्ति मार्ग: जो घर में रहकर भी यह मानते हैं कि "सब कुछ ईश्वर का है, मैं केवल एक सेवक हूं।"
यदि आप अपने परिवार की सेवा भगवान का स्वरूप मानकर करते हैं और यह समझते हैं कि "नाथ सकल संपदा तुम्हारी," तो आप घर में रहकर भी मुक्त हैं। लेकिन अगर आप 'मेरा-तेरा' में फंसे हैं, तो आप माया के जाल में हैं।
बाणासुर का अहंकार और भगवान की लीला
महाराज जी ने सत्संग के दौरान बाणासुर की कथा का सुंदर वर्णन किया। बाणासुर भगवान शिव का परम भक्त था और उसकी हजार भुजाएं थीं। लेकिन अत्यधिक बल ने उसके अंदर अहंकार पैदा कर दिया। उसे अपनी भुजाओं में खुजली होने लगी और वह युद्ध के लिए छटपटाने लगा। अहंकार इतना बढ़ गया कि उसने अपने ही आराध्य भगवान शिव से युद्ध की इच्छा जता दी। भगवान शिव मुस्कुराए और कहा कि तुम्हारा बल कोई मेरे जैसा ही मिटाएगा।
ऊषा-अनिरुद्ध प्रसंग: दिव्य प्रेम और भक्ति
बाणासुर की पुत्री ऊषा और भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की कथा के माध्यम से महाराज जी ने समझाया कि भगवान की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। ऊषा ने स्वप्न में अनिरुद्ध जी को देखा और उनकी सखी चित्रलेखा ने योग विद्या से अनिरुद्ध जी का अपहरण कर उन्हें बाणासुर के महल में पहुँचा दिया। जब बाणासुर को यह पता चला, तो उसने अनिरुद्ध जी को बंदी बना लिया। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण और भगवान शिव के बीच जो युद्ध हुआ, वह वास्तव में बाणासुर के अहंकार को नष्ट करने की एक लीला थी।
वृंदावन वास और अकिंचन भाव
जो लोग वृंदावन में रहते हैं या वहां जाने की इच्छा रखते हैं, उनके लिए महाराज जी की सीख बहुत महत्वपूर्ण है। वृंदावन की रज में वो शक्ति है जो किसी भी पापी को पावन कर सकती है। महाराज जी कहते हैं कि वृंदावन के किसी भी निवासी में दोष दर्शन न करें। "अगर श्री जी (राधा रानी) ने उसे यहां रखा है, तो हमारी क्या मजाल कि हम उसमें कमी निकालें?" सच्ची भक्ति तभी संभव है जब हम 'अकिंचन' (जिसके पास अपना कुछ न हो) बन जाएं।
जीवन का सार: नाम जप और दैन्य भाव
इस पूरे प्रवचन का सार यह है कि हमारा जीवन बहुत अनमोल है और समय तेजी से निकल रहा है। जैसे आकाश से गिरती हुई बूंद जमीन पर गिरते ही गंदी हो जाती है, वैसे ही आत्मा जब गर्भ से बाहर आती है, तो माया उसे घेर लेती है।
क्या करें?
- नाम जप: दिन-रात अपने इष्ट का नाम रटते रहें। यही एकमात्र सहारा है।
- दैन्य वाणी: सबके प्रति कोमलता और दया का भाव रखें। खुद को सबसे छोटा समझें।
- सावधानी: न किसी की बुराई करें, न सुनें।
दोस्तों, आध्यात्मिक मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलने जैसा है, लेकिन अगर हम पूज्य प्रेमानंद जी महाराज जैसे संतों के वचनों को अपने जीवन में उतार लें, तो यह मार्ग सुगम हो जाता है। निंदा और मोह—ये दो ऐसी बेड़ियाँ हैं जो हमें संसार से बांधे रखती हैं।
याद रखें, "सब दिन होत न एक समान," इसलिए जो समय मिला है, उसे व्यर्थ की बातों में नहीं बल्कि 'हरि नाम' में लगाएं। यदि आपको यह पोस्ट पसंद आई हो, तो इसे अपने मित्रों के साथ साझा करें और भक्ति के इस मार्ग पर हमारे साथ जुड़े रहें।
जय श्री राधे राधे!
1 टिप्पणियाँ
Nice
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