असफलता का अंत ही सफलता की शुरुआत है— प्रेमानंदजी महाराज
लेकिन वृंदावन की पावन धरा के संत पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज एक ऐसी बात कहते हैं जो आपकी पूरी सोच को बदल सकती है। वे कहते हैं कि "गिरना भी असल में दौड़ना ही है।" यह विचार सुनने में जितना सरल है, इसका प्रभाव उतना ही गहरा है। महाराज जी के अनुसार, संघर्ष के मार्ग पर फिसलन होना स्वाभाविक है, लेकिन उस फिसलन को अपनी हार मान लेना सबसे बड़ी गलती है।
यह ब्लॉग पोस्ट महाराज जी के उस ओजस्वी संदेश पर आधारित है, जो न केवल एक साधक के लिए बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए संजीवनी बूटी की तरह है जो अपने जीवन में हार मान चुका है। आइए, इस लेख के माध्यम से हम विस्तार से जानते हैं कि कैसे हम अपनी निराशा को आशा में और अपनी हार को एक महा-विजय में बदल सकते हैं।
असफलता और विकारों पर विजय का मार्ग:
गिरने का डर त्यागें:
जीवन एक दौड़ की तरह है। जब हम दौड़ते हैं, तो कभी-कभी संतुलन बिगड़ना और गिरना लाजिमी है। महाराज जी कहते हैं कि यदि आप एक हजार बार भी नाली में गिर जाते हैं, तो भी हार मत मानिए। दुनिया आपको गिरा हुआ देख सकती है, लेकिन आपको खुद को एक योद्धा की तरह देखना है। गिरने का अर्थ यह नहीं है कि आप दौड़ से बाहर हो गए हैं, बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप अभी भी मैदान में हैं। हर बार गिरने के बाद जब आप अपनी छाती ठोककर खड़े होते हैं, तो आप पहले से अधिक मजबूत हो जाते हैं।
हार में छिपी सूक्ष्म विजय का विज्ञान:
महाराज जी एक बहुत ही रहस्यमयी बात बताते हैं कि "प्रत्येक पराजय में एक सूक्ष्म विजय छिपी होती है।" यह बात सामान्य आँखों से नहीं दिखती। जब हम हारते हैं, तो हमें उस 'चूक' का पता चलता है जिसने हमें गिराया। वह हार हमें आत्म-निरीक्षण (Self-Analysis) के लिए मजबूर करती है। यह सूक्ष्म विजय ही है जो हमें आने वाली बड़ी विपत्तियों से सावधान कर देती है। इसलिए, अपनी असफलताओं से घृणा न करें, बल्कि उन्हें अपना गुरु मानकर उनसे सीखें।
मन के विकारों से युद्ध:
काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे विकार हमारे मन के भीतर के शत्रु हैं। ये हमें बार-बार आकर्षित करते हैं और फिर हमें ग्लानि के गर्त में ढकेल देते हैं। महाराज जी का कहना है कि इन विकारों को अपना स्वरूप मत मानिए। ये बाहर से आए हुए रोग हैं। जब ये विकार आपके मन में हलचल मचाएँ, तो डरिए मत। इन्हें 'सत्ता' देना बंद करें। जैसे ही आप इन्हें महत्व देना छोड़ देंगे, इनकी शक्ति क्षीण होने लगेगी। यदि आप इनके आकर्षण में जलना पसंद करेंगे लेकिन अपने मार्ग से पीछे नहीं हटेंगे, तो एक दिन ये विकार स्वयं ही भस्म हो जाएंगे।
आपकी पहचान क्या है?
परमार्थ और सफलता का मार्ग कायरों के लिए नहीं है। यह शूरवीरों का मार्ग है। कायर वह है जो एक-दो बार गिरने पर बैठकर रोने लगता है और किस्मत को दोष देता है। शूरवीर वह है जो लहूलुहान होने के बावजूद खड़ा होता है और कहता है, "अभी बाजी बाकी है!" महाराज जी हमें प्रेरित करते हैं कि हमें अपनी हार का ढिंढोरा नहीं पीटना है, बल्कि सूक्ष्मता से यह देखना है कि गलती कहाँ हुई। क्या हमारा खान-पान बिगड़ा? क्या हमारा संग गलत था? या क्या हमने अपने विचारों पर नियंत्रण खो दिया? अपनी कमजोरियों को पकड़ें और उन्हें जड़ से मिटाने का संकल्प लें।
चिदानंद स्वरूप:
महाराज जी बार-बार याद दिलाते हैं कि हम साधारण शरीर नहीं हैं। हम "चिदानंद स्वरूप" हैं—आनंद और चेतना का अंश। हमारी आत्मा में इतनी सामर्थ्य है कि वह ब्रह्मांड की किसी भी शक्ति को चुनौती दे सकती है। लेकिन हम भोगों और वासनाओं के छोटे-छोटे टुकड़ों के लिए रो रहे हैं। हमने अपनी असली पहचान को भुला दिया है। जब आप यह जान लेंगे कि आप ईश्वर के अंश हैं, तो निराशा और हताशा आपके पास फटक भी नहीं पाएगी। अपनी इस आंतरिक शक्ति को जगाने का समय आ गया है।
मोह निद्रा से जागना:
जब हम गलत आदतों में फंसते हैं, तो असल में हम "मोह की निद्रा" में सो रहे होते हैं। उस समय हमारा विवेक, हमारा विचार और हमारी भगवत्स्मृति कहीं खो जाती है। महाराज जी कहते हैं कि उस समय जागो! अपने मन से पूछो कि तुम यह क्या कर रहे हो? यह गंदी चेष्टा तुम्हें कहाँ ले जाएगी? अपने विवेक को जगाना ही असली पुरुषार्थ है। जैसे ही विवेक जागता है, मन का सारा जाल छिन्न-भिन्न हो जाता है।
भगवान पर अटूट विश्वास:
इस पूरी लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार है 'विश्वास'। भगवान श्रीकृष्ण के चरणों का आश्रय लेकर जो चलता है, उसकी हार संभव ही नहीं है। महाराज जी अपने स्वयं के अनुभवों से बताते हैं कि उन्होंने कृष्ण कृपा को अपनी आँखों से देखा है। उन्होंने देखा है कि कैसे भीषण से भीषण विकार भी भगवान के नाम की शक्ति के सामने टिक नहीं पाते। जब आप भगवान के हो जाते हैं, तो संसार के बड़े से बड़े भोग आपको विष्ठा (गंदगी) के समान लगने लगते हैं।
अभ्यास और धैर्य का महत्व:
सफलता रातों-रात नहीं मिलती। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। महाराज जी कहते हैं कि आज यदि आपका मन विचलित हो रहा है, तो भी आगे बढ़ते रहिए। एक दिन वह समय आएगा जब आप सीना ठोककर कहेंगे कि अब किसी की ताकत नहीं जो मुझे हिला सके। यह अवस्था अभ्यास से आती है। जैसे-जैसे आप अपनी वृत्तियों को भगवान की ओर मोड़ेंगे, वैसे-वैसे संसार की पकड़ ढीली होती जाएगी।
अनुभवों की आग में तपकर कुंदन बनना:
महाराज जी समझाते हैं कि जीवन में आने वाली हर बाधा हमें तपाने के लिए आती है। जैसे सोना आग में तपकर कुंदन बनता है, वैसे ही एक साधक या संघर्षशील व्यक्ति ठोकरों की आग में तपकर महान बनता है। यदि आप आज गिर रहे हैं, तो समझिए कि आपकी ट्रेनिंग चल रही है। भगवान आपको भविष्य की किसी बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार कर रहे हैं।
परम शांति और शीतलता का अनुभव:
अंत में, जब आप हार नहीं मानते और निरंतर प्रयास करते रहते हैं, तो आपको उस "शीतलता" का अनुभव होता है जिसके सामने दुनिया के सारे सुख फीके हैं। महाराज जी कहते हैं कि उन्होंने वह शांति देखी है, वह आनंद चखा है। उसी बल पर वे पूरी दुनिया को चुनौती देते हुए कहते हैं कि विषयों में कोई सुख नहीं है। असली सुख तो अपने स्वरूप में स्थित होने और भगवान के चरणों की सेवा में है।
याद रखिये, बाजी अभी खत्म नहीं हुई है। जब तक आप लड़ रहे हैं, आप हारे नहीं हैं। उठिए, जागिए और तब तक मत रुकिए जब तक आप उस परम विजय को प्राप्त न कर लें। इस पोस्ट को अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ साझा अवश्य करें।
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